समास किसे कहते हैं? | समास की परिभाषा, भेद और उदाहरण

समास के बारे में जानने से पहले आपको समास किसे कहते है इसे जानना बेहत जरुरी होता है I समास को बेहतर तरीके से समझने के लिए आप एक नोट बनाईये और अच्छे -अच्छे टोपिक को नोट कीजिये I

समास की परिभाषा

समास शब्द का अर्थ संक्षिप्त या छोटा करना है। दो या दो से अधिक शब्दों के मेल या संयोग को समास कहते हैं। इस मेल में विभक्ति चिहनों का लोप हो जाता है।
भाषा में संक्षिप्तता बहुत ही आवश्यक होती है और समास इसमें सहायक होते हैं। समास द्वारा संक्षेप में कम से कम शब्दों द्वारा बड़ी से बड़ी और पूर्ण बात कही जाती है।
समास का उद्भव ही समान अर्थ को कम से कम शब्द में करने की प्रवृत्ति के कारण हुआ है।

जैसे :- दिन और रात में तीन शब्दों के प्रयोग के स्थान पर ‘दिन-रात’ एक समस्त शब्द किया जा सकता है। 

इस प्रकार दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से विभक्ति चिह्नों के लोप के कारण जो नवीन शब्द बनते हैं उन्हें सामासिक या समस्त पद कहते हैं।

सामासिक शब्दों का संबंध व्यक्त करने वाले विभक्ति चिहनों आदि के साथ प्रकट करने अथवा लिखने वाली रीति को ‘विग्रह’ कहते हैं।
जैसे- ‘धनसंपन्न’ समस्त पद का विग्रह ‘धन से संपन्न’, ‘रसोईघर’ समस्त पद का विग्रह ‘रसोई के लिए घर’ समस्त पद में मुख्यतः दो पद होते हैं-पूर्वपद व उत्तरपद।
पहलेवाले पद को ‘पूर्वपद’ व दूसरे पद को ‘उत्तरपद’ कहते हैं।

समस्त पद पूर्वपदउत्तरपद समास विग्रह
पूजाघरपूजाघर पूजा के लिए घर
माता-पितामातापितामाता और पिता
नवरत्न नवरत्ननौ रत्नों का समूह
हस्तगतहस्तगतहस्त में गया हुआ

समास के भेद

मुख्यतः समास के चार भेद होते हैं। जिन दो शब्दों में समास होता है, उनकी प्रधानता अथवा अप्रधानता के विभागत्व पर ये भेद किए गए हैं।

जिस समास में पहला शब्द प्रायः प्रधान होता है, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं; जिस समास में दूसरा शब्द प्रधान रहता है, उसे तत्पुरुष कहते हैं। जिसमें दोनों शब्द प्रधान होते हैं, वह द्वंद्व कहलाता है और जिसमें कोई भी प्रधान नहीं होता उसे बहुब्रीहि समास कहते हैं।

तत्पुरुष के पुनः दो अतिरिक्त किंतु स्वतंत्र भेद स्वीकार किए गए हैं-कर्मधारय समास एवं द्विगु समास। विवेचन की सुविधा के लिए हम समास का निम्न छह प्रकारों के अंतर्गत अध्ययन करेंगे- 

1. अव्ययीभाव समास

इस समास में परिवर्तनशीलता का भाव होता है और उस अव्यय पद का रूप लिंग, वचन, कारक में नहीं बदलता वह सदैव एकसा रहता है। इसमें पहला पद प्रधान होता है, जैसे-

समस्त पदविग्रह
यथाशक्ति शक्ति अनुसार
यथासमयसमय के अनुसार
प्रतिक्षणहर क्षण
यथासंभवजैसा संभव हो
आजीवनजीवन भर
भरपेट पेट भरकर
आजन्मजन्म से लेकर
आमरणमरण तक
प्रतिदिनहर दिन
बेखबरबिना खबर के

अपवाद-हिंदी के कई ऐसे समस्त पद जिनमें कोई शब्द अव्यय नहीं होता परंतु समस्त पद अव्यय की तरह प्रयुक्त होता है, वहाँ भी अव्ययीभाव समास माना जाता है, जैसे-

घर-घर घर के बाद घर
रातों-रात रात ही रात में

 2. तत्पुरुष समास

इस समास में पहला पद गौण व दूसरा पद प्रधान होता है। इसमें कारक के विभक्ति चिह्नों का लोप हो जाता है (कर्ता व संबोधन कारक को छोड़कर) इसलिए छह कारकों के आधार पर इस समास के भी छः भेद किए गए हैं।

(क) कर्म तत्पुरुष समास (‘को’ विभक्ति चिह्नों का लोप)

समस्त पदसमास विग्रह
सर्वप्रिय सर्व को प्रिय
पदप्राप्तपद को प्राप्त
ग्रामगतग्राम को गया हुआ
यशप्राप्तयश को प्राप्त
शरणागतशरण को आया हुआ
सर्वप्रियसभी को प्रिय

(ख) करण तत्पुरुष समास (‘से’ चिहन का लोप होता है)

समस्त पदसमास विग्रह
बाढ़पीड़ित बाढ़ से पीड़ित
भावपूर्ण भाव से पूर्ण
बाणाहतबाण से आहत
हस्तलिखितहस्त से लिखित

(ग) संप्रदान तत्पुरुष समास (‘के लिए’ चिह्न का लोप) 

समस्त पद
विद्यालय विद्या के लिए आलय
गुरुदक्षिणागुरु के लिए दक्षिणा
बालामृतबालकों के लिए अमृत
राहखर्चराह के लिए खर्च
युद्धभूमि युद्ध के लिए भूमि

(घ) अपादान तत्पुरुष समास (‘से’ पृथक या अलग के लिए चिहन का लोप)

समस्त पदसमास विग्रह
पथभ्रष्ट पथ से भ्रष्ट
देशनिकालादेश से निकाला
बंधनमुक्तबंधन से मुक्त
ऋणमुक्तऋण से मुक्त

(ङ) संबंध तत्पुरुष कारक (‘का’, ‘के’, ‘की’ चिहनों का लोप)

समस्त पदसमास विग्रह
जलधारा जल की धारा
गंगाजलगंगा का जल
नगरसेठनगर का सेठ
राजमाताराजा की माता
मतदाता मत का दाता

(च) अधिकरण तत्पुरुष समास (‘में’, ‘पर’ चिह्नों का लोप) 

समस्त पदसमास विग्रह
घुड़सवार घोड़े पर सवार
जलमग्नजल में मग्न
आपबीतीआप पर बीती
सिरदर्दसिर में दर्द

3. कर्मधारय समास

इस समास के पहले तथा दूसरे पद में विशेषण, विशेष्य अथवा उपमान उपमेय का संबंध होता है, जैसे-

समस्त पद 

विशेषण विशेष्यविग्रह
प्राणप्रिय प्रिय है जो प्राणों को
महापुरुषमहान है जो पुरुष
पीतांबरपीला है जो अंबर
उपमेय-उपमानविग्रह
मृगनयनीमृग के समान नेत्रवाली
चंद्रवदनचंद्रमा के समान वदन (मुँह)
कमलनयनकमल के समान नयन
विद्याधनविद्या रूपी धन
भवसागरभव रूपी सागर

 4. द्विगु समास 

इस समास का पहला पद संख्यावाचक अर्थात गणना-बोधक होता है तथा दूसरा पद प्रधान होता है क्योंकि इसमें बहुधा यह जाना जाता है कि इतनी वस्तुओं का समूह है, जैसे-

समस्त पदविग्रह
सप्ताहसात अहतों का समूह
नवरत्ननौ रत्नों का समूह
त्रिमूर्तितीन मूर्तियों का समूह
शताब्दीसौ अब्दों (वर्षों) का समूह
त्रिभुजतीन भुजाओं का समूह
पंचरात्रपंच (पाँच) रात्रियों का समाहार

अपवाद- कुछ समस्त पदों में शब्द के अंत में संख्यावाचक शब्दांश आता है, जैसे- 

पक्षद्वयदो पक्षों का समूह
लेखकद्वयदो लेखकों का समूह
संकलनत्रयतीन संकलनों का समूह

5. द्वन्द्व समास

इस समास में दोनों पद समान रूप से प्रधान होते हैं। इसके दोनों पद योजक चिह्न द्वारा जुड़े होते हैं तथा समास-विग्रह करने पर ‘और’, ‘या’ ‘अथवा’ तथा ‘एवं’ आदि लगते हैं, जैसे-

समस्त पदविग्रह
हानि-लाभ हानि या लाभ
रात-दिनरात और दिन
सीता-रामसीता और राम
दाल-रोटीदालऔर रोटी
माता-पितामाता और पिता
आयात-निर्यातआयात और निर्यात
आना-जाना आना और जाना

6.बहुब्रीहि समास

जिस समास में पूर्वपद व उत्तरपद दोनों ही गौण हों और अन्य पद प्रधान हो और उसके शाब्दिक अर्थ को छोड़कर एक नया अर्थ निकाला जाता है, वह बहुब्रीहि समास कहलाता है, जैसे लंबोदर अर्थात लंबा है उदर (पेट) जिसका दोनों पदों का अर्थ प्रधान न होकर अन्यार्थ ‘गणेश’ प्रधान है।

समस्त पदविग्रह
घनश्याम घन जैसा श्याम अर्थात् कृष्ण
नीलकंठनीला कंठ है जिसका अर्थात् शिव
दशाननदस आनन हैं जिसके अर्थात् रावण
गजाननगज के समान आनन वाला अर्थात् गणेश
त्रिलोचनतीन हैं लोचन जिसके अर्थात् शिव
महावीरमहान है जो वीर अर्थात् हनुमान
दिगंबरदिशा ही है अंबर जिसका अर्थात् शिव
चतुर्भुजचार भुजाएँ हैं जिसके अर्थात् विष्णु

यह देखा जाता है कि कुछ समासों में कुछ विशेषताएँ समान पाई जाती हैं लेकिन फिर भी उनमें मौलिक अंतर होता है। समान प्रतीत होने वाले समासों के अंतर को वाक्य में भिन्न प्रयोग के कारण समझा जा सकता है। कुछ शब्दों में दो अलग-अलग समासों की विशेषताएँ दिखाई पड़ती हैं। 

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न –

कर्मधारय और बहुब्रीहि समास में अंतर

कर्मधारय समास में दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य तथा उपमान उपमेय का संबंध होता है लेकिन बहुब्रीहि समास में दोनों पदों का अर्थ प्रधान न होकर ‘अन्यार्थ’ प्रधान होता है।
जैसे-मृगनयन-मृग के समान नयन (कर्मधारय) तथा नीलकंठ वह जिसका कंठ नीला है-शिव अर्थात ‘शिव’ अन्यार्थ लिया गया है (बहुब्रीहि समास)

बहुव्रीहि व द्विगु समास में अंतर

 द्विगु समास में पहला पद संख्यावाचक होता है और समस्त पद समूह का बोध कराता है लेकिन बहुब्रीहि समास में पहला पद संख्यावाचक होने पर भी समस्त पद से समूह का बोध न होकर अन्य अर्थ का बोध कराता है। 
जैसे-चौराहा अर्थात चार राहों का समूह (द्विगु समास)
चतुर्भुज-चार हैं भुजाएँ जिसके (विष्णु) अन्यार्थ (बहुब्रीहि समास)

संधि और समास में अंतर 

संधि में दो वर्षों या ध्वनियों का मेल होता है पहले शब्द की अंतिम ध्वनि और दूसरे शब्द की आरंभिक ध्वनि में परिवर्तन आ जाता है, जैसे ‘लंबोदर’ में ‘लंबा’ शब्द की अंतिम ध्वनि ‘आ’ और ‘उदर’  शब्द की आरंभिक ध्वनि ‘उ’ में ‘आ’ व ‘उ’ के मेल से ‘ओ’ ध्वनि में परिवर्तन हो जाता है।
इस प्रकार संधि में दो या दो से अधिक शब्दों की कमी न होकर ध्वनियों का मेल होता है किंतु समास में ‘लंबोदर’ का अर्थ ‘लंबा है उदर जिसका’ शब्द समूह बनता है। अतः समास में मूलतः शब्दों का योग होता है जिसका उद्देश्य पद में संक्षिप्तता लाना है।

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